सम्भव है फाइलेरियोसिस का होम्योपैथिक उपचार

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Hahnemann Ki Aawaz Posted on 14 – 02 – 2014

आपने देखा होगा कि अनेक लोगों के पैर हाथी के पांव जैसे हो जाते है। वे चिकित्सालय पर आकर कहते हैं कि मैं बहुत परेशान हो चुका हूँ, बहुत इलाज कराया परन्तु कुछ फायदा नहीं हो रहा है। डॉ0 साहब आप ही कुछ करिये जिससे मुझे फायदा हो सके और साथ ही रोगी अपने रोग के सम्बन्ध में अनेक प्रशन करता है कि यह कौन सा रोग है, कैसे होता है, इसका क्या उपचार है, कहीं यह हमारी संतान में भी तो नही हो जायेगा और इससे कैसे बचा जा सकता हैं?

हाथी पांव जिसे फील पांव के नाम से भी जाना जाता है चिकित्सीय भा़षा में इसे एलीफेन्टाइटिस  के नाम से पुकारा जाता है, यह समस्या फाइलेरियोसिस के कारण होती है। अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की तरहफाइलेरियोसिस भी भारत की एक गम्भीर स्वास्थ्य समस्या है पयार्वरण के कुप्रबन्धन के कारण यह समस्या  बढ़ती जा रही है। इस रोग से ग्रसित रोगी ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, आन्ध्र प्रदेश उड़ीसा, तामिलनाडु, केरल एवं गुजरात में ज्यादा पाये जाते है अन्य राज्यों में यह समस्या गम्भीर रूप में नहीं होती है। प्रस्तुत लेख मेंफाइलेरियोसिस के कारण, बचाव, इससे होने वाली जटिलताओं एवं होमियोपैथिक उपचार के सम्बन्ध में जानकारी दी जा रही है। आखिर क्या है फाइलेरियोसिस एक बीमारी है जो निमोरोड जाति के परजीवि जिसे माइक्रोफाइलेरिया के नाम से जाना जाता है के संक्रमण से होता है। माइक्रोफाइलेरिया एक धागेनुमा लम्बा कीड़ा होता है जो क्यूलेक्स मच्छर के द्वारा एक रोगी में फैलता है। सामान्यतः रोगी के रक्त में रात में माइक्रोफाइलेरिया सबसे ज्यादा होते है और रोग संवाहक मच्छर रात में रोगी व्यक्ति को काट कर जब दूसरे व्यक्ति को काटता है तब उसे भी फाइलेरियोसिस का संक्रमण हो सकता है। क्या कारण है फाइलेरियोसिस के कारण फाइलेरियोसिस के लिए अनेक कारण जिम्मेदार है उन कारणों में प्रमुख है 1. वातावरण माइक्रोफाइलेरिया गर्म क्षेत्रों में ज्यादा पाया जाता है तथा इसका संवाहक मच्छर गन्दगी, पानी में जमाव, कूड़ेकचरे के सही निस्तारण न होने के कारण ज्यादा पनपते है तथा ज्यादा समय तक इस प्रकार के वातावरण में जिन्दा रहते है। यह मच्छर ज्यादातर सोकपिट, सिपटिक टैंक, खुले हुए मेनहोल, गन्दे पानी से भरे हुए गड्े आदि में ज्यादा पनपते एवं रहते है। क्या होते है फाइलेरियोसिस के लक्षण संक्रमित मच्छर के काटने के 6 से 16 माह या इससे अधिक समय के बाद इस रोग के लक्षण प्रकट होने लगते है। फाइलेरियोसिस के प्ररम्भिक लक्षण कुछ इस प्रकार है ठंडक के साथ तेज बुखार, सरदर्द, थकान, जी मिचलाना, बदन दर्द, प्यास, कमजोरी के लक्षण पाये जाते है। बुखार एक निशचत अन्तराल के बाद आता है। जब फाइलेरिया पैरासाइट रोगी के लिम्फेटिक सिस्टम में चला जाता है तो इस प्रकार के लक्षण प्रकट होते है लिम्फ गरंथियों में सूजन, कड़ापन, दर्द। अण्डको़शों में सूजन, कड़ापन, दर्द, हाइड्रोसिल, पैरों में सूजन कभीकभी यह हाथों में भी हो जाती है। महिलाओं के स्तन में भी सूजन कड़ापन दर्द हो जाता है।फील पांव या हाथी पांव अथवा एलीफेन्टाइटिस का हो जाना।

कैसे कराये फाइलेरियोसिस की जाँच फाइलेरियसिस की जांच के लिए खून की जांच जिसमें ल्यूकोसाइटस के साथ कभी कभी म्वेपदवचीपसपं भी ब़ी होती है। माइक्रो फाइलेरिया जाँच इम्यूनोग्लोबूलिन म्ए इम्यूलोग्लोबूलिन ळ ;म्सपेंद्ध जांच में फालेरियोसिस बढ़ा होगा। स्लउचींदहपवहतंचील जांच।

कैसे करें फाइलेरियसिस से बचाव फाइलेरियसिस से बचाव के लिए निम्न सावधानियां अपनानी चाहिए आपसपास मच्छर न पनपने दे तथा मच्छर पनपने में सहायक पानी एकत्र होने वाले स्थानो को साफ रखे गन्दगी एकत्र होने वाले स्थानों को साफ रखें, गन्दगी एकत्र न होने दें। रात में मच्छरदानी लगाकर सोयें। इसके अतिरिक्त रोग के लक्षण प्रकट होने पर तत्काल चिकित्सक की सलाह लें।

फाइलेरियोसिस का होमियोपैथिक उपचार फाइलेरियसिस के उपचार में होमियोपैथिक दवाइयां बहुत ही कारगर एवं प्रभावी हैं परन्तु होमियोपैथिक उपचार चिकित्सक द्वारा ही करवाना चाहिए। अपने आप होमियोपैथिक दवाइयों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। फाइलेरियोसिस के उपचार के लिए रोगी के लक्षणों के आधार पर औ़षधियों का चयन किया जाता है। इसके उपचार में प्रयुक्त होने वाली मुख्य औ़षधियां हैं बेलाडोना, आसेर्निक, चायना, ब्रायोनिया, पल्सटिला, नेट्रम म्यूर, यूपेटोरियम पर्फ, सीड्रान, हाइड्रोकोटाइल आदि।

इसी पंकार फील पांव या एलीफेन्टाइटिस के उपचार में प्रयोग होने वाली औषधियों में, हाइड्रोकोटाइल, एनाकार्डियम, माइरिस्टका, आसेर्निक, साइले.शिया, एपिस आदि। इसी परकार हाइड्रोसिल के उपचार में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख औ़षधियां है एपिस, आरम, कैक्केरिया लोर, कोनियम, लोरिक एसिड, गरेफाइटिस, आयोडम, रोडोडेन्ड्रान, स्पान्जिया आदि। धयान रहे कि उपचार धैर्य पूर्वक कराना चाहिए तथा चिकित्सक की सलाह पर ही उपचार बन्द करना चाहिए। होमियोपैथी दवाइयां आपकी फाइलेरिया की समस्या के समाधान में प्रभावी माध्यम हो सकती है।

डॉ0 अनिरुद्ध वर्मा

सदस्य, केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद

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