क्या आपका बच्चा मिट्टी खाता है?

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Hahnemann Ki Aawaz Posted on 15 – 02 – 2015

A Child

मैं बहुत परेशान हूं क्या करूँ? मेरा लगभग 2 वर्ष का बच्चा है जो मिट्टी, रेत, पत्थर, रबड़ उंगली के नाखून, कागज, पेट के टुकड़े, चैक, कोयला, लकड़ी, प्लास्टर, धागे, चूल्हे की मिट्टी, धागे, जली हुई माचिस, खडि़या आदि खाता रहता है। इस प्रकार की शिकायतें लेकर माताएं आती रहती हैं। आखिर क्या है बच्चों की ये समस्या और इससे कैसे निपटा जा सकता है।बच्चों में यह समस्या सामन्यतः 18 से 24 महीने से कम उम्र के बच्चों में पाई जाती है। चिकित्सीय भाषा में इसे पाइका कहते हैं। यह उन बच्चों में ज्यादा होती है जिन्हें पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिलते हैं। यह उन बच्चों में भी ज्यादा होती हैं जिनमें विकास संबंधी अक्षमता और मानसिक अवरोध बहुत सामान्य होता है।

क्या कारण है

पाईका का कोई स्टीक कारण नहीं पता चला है, परन्तु यह कई शिकायतों से संबंधित है जैसे:

1- लौह भोजन में लौह तत्वों की कमी।

2- मातृत्व की कमी के कारण तनाव।

3- माता पिता से अलगाव।

4-माता-पिता द्वारा ध्यान न देना, बच्चों से दुव्र्यवहार।

5- निम्न सामाजिक स्तर, निम्न आर्थिक स्तर।

6- भोजन में पोषक तत्वों का अभावरोग की पहचान व उसके लक्षण।

7-बच्चा चुराकर इन चीजों को खाता है तथा पूछने पर इंकार करता है।

8- हर बच्चा अलग-अलग चीजें खाता है।

9- इन चीजों के खाने से बच्चे में कब्ज, पेट दर्द, एनीमिया, मितली, उल्टी, पेट का बड़ा होना, भूख की कमी, कमजोरी, घाव फंुसिया और कभी कभी आंत में अवरोध भी हो सकता है।

शरीर पर क्या असर होता है

इन अखाद्य़ चीजों के खाने के कारण स्नायु विकार, चिड़-चिड़ाहट, आलस्य, मतिभ्रम, आँख की बीमारी, पेट में कीडे, शरीर का सही विकास न होना आदि शारीरिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जो कभी कभी घातक हो सकती हैं।

कैसे निपटे इस समस्या से

बच्चों में पाईका के प्रबंधन के लिए अनेक प्रकार के प्रयास करने चाहिए जिसमें प्रभावी परिणाम के लिए मनोवैज्ञानिक ओर होम्योपैथिक शामिल है। बच्चों के भोजन में पोषक तत्वों की कमी का पता कर उनको पूरा कर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है साथ ही साथ बच्चें को समझना और उस पर नजर रखना बहुत ही आवश्यक है। माता-पिता को बच्चे पर पूरा ध्यान रखना चाहिए।

क्या है समस्या का होम्योपैथी समाधान

बच्चों की इस समस्या के समाधान के लिए होम्योपैथी में अनेक औषधियां हैं जो बच्चे के आचार-विचार, व्यवहार, खान-पान आदि के लक्षणों को ध्यान में रखकर दी जा सकती हैं। इसके उपचार में प्रयोग होने वाली औषधियों में नाइट्रिक एसिड का प्रयोग स्लेट, पेंसिल कागज, चारकोल आदि खाने की इच्छा करने वाले बच्चों में किया जा सकता है। इसी प्रकार एलुमिना का प्रयोग कच्चे चावल, स्टार्च, चारकोल, काफी या चाय की इच्छा रखने वाले बच्चों में किया जाता है। नैट्रम म्योर का प्रयोग ज्यादा नमक, कड़वे मसाले, सिरके, खट्टे की इच्छा वाले बच्चों में किया जा सकता है।

कालकेरिया फाॅस का प्रयोग नमक, सूअर का गोश्त, ज्यादा भुनी हुई चीजों के खाने वाले बच्चों में किया जा सकता है। एनटिम क्रूड का प्रयोग उन बच्चों में किया जा सकता है जो अम्ल, आचार, कच्चा खना और कच्ची सब्जियों की इच्छा रखते हैं।

साइलिसिया का प्रयोग उन बच्चों में किया जा सकता है जो चूना, रेत, कच्चे भोजन की इच्छा रखते हैं। चारकोल, मसाला, एवं चैक खाने की इच्छा रखने वाले बच्चों को  नक्स बोमिका दी जा सकती है।  खाई न जाने वाली वस्तुओं जैसे चैक-चारकोल, कोयला और पेेंसिल खाने की इच्छा रखने वाले बच्चों को कैलकेरिया कार्य औषधि दी जा सकती है। जली रोटी खाने की इच्छा रखने वाले बच्चों को ग्रेफाइटिस दी जा सकती है। चैक, चारकोल, कोयला, पत्तागोभी और न पचने वाली वस्तुओं की असमान्य इच्छा रखने वाले बच्चों को सिकुटा विरोसा औषधि दी जा सकती है। इसके अतिरिक्त होम्योपैथी में ऐसी अनेक औषधियां हैं, जिनका प्रयोग लक्षणों के आधार पर किया जा सकता है। परन्तु ध्यान रहे होम्योपैथिक औषधियां केवल प्रशिक्षित चिकित्सकों की सलाह पर ही लेनी चाहिए।

डाॅ0 अनिरूद्ध वर्मा(एमडी होम्यो)मो0: 9415075558

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